कुदरत का संदेश और इंसानियत की पुकार

जम्मू – कश्मीर संवाददाता/20/10/2025/बुधवार

कैमरा ऑन होते ही सब धर्म और राजनीति की बातें करने लगते हैं,
मगर जैसे ही कैमरा ऑफ होता है, वही लोग भाईचारे की बातें करते हैं।
सच तो यह है कि आज भी हमारे समाज के रास्ते सूने और वीरान हैं — मुआवज़ा नहीं, व्यवस्था नहीं।
हॉस्पिटलों में ड्राइवर नहीं, एम्बुलेंस स्टाफ नहीं,
लिंक रोड आज भी बिना चौड़ीकरण के अधूरी पड़ी है।
और इन सबके बीच इंसान इंसान को मज़हब के नाम पर बेच रहा है।
कुदरत ने जब कहर बरपाया था,
तो किसी ने न हिंदू देखा न मुसलमान —
सब एकजुट हुए, एक-दूसरे की मदद की,
इंसानियत की असली तस्वीर वहीं दिखी थी।
मगर अफसोस, अब वही इंसान फिर मज़हब तलाश रहा है।
क्या इतना जल्दी कुदरत के वो मंज़र भूल गए?
क्या अब भी समझ नहीं आए कि कुदरत सब देखती है,
और जब उसका इंसाफ होता है, तो किसी का पक्ष नहीं लेती।
मुझे मत छेड़ो, मैं पहले ही टूटा हुआ हूं,
दिल पर गहरी चोट खाई है।
अब बस इतना चाहता हूं कि लोग
कुदरत और इंसानियत के लिए अच्छे अल्फ़ाज़ बोलें,
और अगर न बोल सकें — तो कम से कम नफ़रत न फैलाएँ।
अब वक्त है बेहतर से बेहतरीन सोचने का।
MLA हो, दो राज्यसभा सदस्य हों, DDC हों —
लेकिन अगर सोच वही पुरानी रही,
तो विकास के रास्ते फिर वीरान ही रह जाएंगे।
कुदरत सब जानती है, और इंसाफ जब होगा —
तो किसी का भी उधार नहीं छोड़ेगी।
— Er. Anil Kumar Shan

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