किश्तवाड़, 25 सितम्बर 2025
लोकतंत्र, संवाद और विकास: लद्दाख व जम्मू-कश्मीर से सबक | लद्दाख में हाल ही में हुई हिंसा और करगिल डेमोक्रेटिक एलायंस (KDA) द्वारा बुलाए गए बंद ने यह साफ कर दिया है कि जनता की आवाज़ को अनसुना करना खतरनाक हो सकता है। लद्दाख में संवाद और संवैधानिक सुरक्षा की मांग उठ रही है, वहीं जम्मू-कश्मीर केन्द्र शासित प्रदेश (UT) में भी वही असंतोष गहराता जा रहा है।
चिनाब घाटी, पीर पंजाल और कश्मीर क्षेत्र के दूरदराज़ इलाकों में लोग कई तरह की परेशानियों का सामना कर रहे हैं:
बेरोजगारी: शिक्षित युवा रोज़गार के अवसरों से वंचित हैं।
अधूरे विकास कार्य: सड़कें, पेयजल योजनाएँ, अस्पताल, बिजली परियोजनाएँ और दूरसंचार योजनाएँ अधूरी या अटकी हुई हैं।
लोकतांत्रिक कमी: नियमित चुनावों की अनुपस्थिति और जमीनी स्तर पर प्रतिनिधित्व की कमी से जनता में अलगाव बढ़ रहा है।
टूटे वादे: सरकार द्वारा किए गए वादे अधूरे रह गए हैं, जिससे अविश्वास और असंतोष गहराता जा रहा है।
यदि इन मुद्दों को समय पर हल नहीं किया गया, तो जम्मू-कश्मीर में भी हालात लद्दाख जैसे बिगड़ सकते हैं।
शांति को चुप्पी से नहीं, बल्कि संवाद और विश्वास से कायम किया जा सकता है।
आंदोलनकारियों और सिविल सोसायटी से ईमानदार संवाद शुरू किया जाए।
रोजगार और विकास कार्यों के लिए पारदर्शी समय-सीमा तय की जाए।
लोकतांत्रिक भागीदारी बहाल करने के लिए चुनाव कराए जाएँ और स्थानीय निकायों को सशक्त किया जाए।
जनता का विश्वास जीतने के लिए दृश्यात्मक कार्रवाई की जाए, केवल आश्वासन नहीं।
लद्दाख और जम्मू-कश्मीर के युवा किसी दान की मांग नहीं कर रहे, बल्कि वे भारत के लोकतांत्रिक ढांचे के भीतर गरिमा, अवसर और न्याय की मांग कर रहे हैं। इंजि. अनिल कुमार शान
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